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संबंध और धर्म

अक्सर कहते है,जीने के लिए किसी का भी,समूह 
में रहना जरूरी होता हैं,लेकिन,सत्य ये है कि,कितने
ही व्यक्ति समूह में रह कर,भी अकेले होते है,जबकि
हमेशा कुछ जाने पहचाने व्यक्ति उनके साथ होते है,
इस बात को समझ ने कि कोशिश करते है,क्या होता
है? व्यक्ति के विचार,उसे समूह से जोड़ कर रखते है,
फ़िर भी उसी समुह के व्यक्ति,एक विचार वाले होते हुए
भी अलग अलग वातावरण में बड़े होने के कारण,और
कभी कभी एक वातावरण के होते हुए भी मानसिक
स्तर पर अलग होते हैं,लेकिन कार्यप्रणाली एक हो सकती हैं,व्यक्ति के दिमाग और कार्य व्यवस्था का
सन्तुलन ही सामान्य को आगे ले कर जा सकता है
यही बात जब किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में,कही जाए
जों वस्तव में स्वयं में परिवर्तन चाहता हो,न कि अन्य में,तो ये बात  बादल सकती हैं क्योंकि यहां ऊर्जा के स्तर पर कार्य होते है,यह परिवर्तन,व्यक्ति की ईच्छा होते हुए भी,किसी और के द्वारा होते है,क्योंकि यहां "कार्य और कारण" का प्रमाण वह ही समझ पाता है जो इस तरह
की वास्तविक अवस्था से निकाल चुका हो,ये बात जितनी आसानी से मैं लिख रही हूं उतनी आसनी से
समझ में नहीं आती, क्योंकि योग्यता का माप प्रदान
करने वाला समूह अलग से कार्य करता है,जिसके
मापदंड या नियम अलग होते है और भी कई बातें
होती हैं जो,एक व्यक्ति को किसी समूह से जोड़ कर या
एक साथ होते हुए भी मानसिक स्तर पर अलग करती
है, यहां परिवर्तन अलग होते हैं।
मल्लिका जैन 🙏😀

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