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मैटर ऑफ सर्वाइवल

अक्सर ये समझ में नहीं आता कि हम जो तकलीफ़ उठा
रहे, हैं वो वास्तव में हमारी है या दूसरों की,कुछ लोगो,
आदतन ऐसे ही होते हैं,जो दूसरो की तकलीफ़ खुद लेे 
लेते हैं,क्या कहें इन्हीं व्यक्तियों से ये संसार चलता है,
क्या कभी आपने सोचा है कि क्यो,इंसान ही दूसरो कि
सहायता करते हैं?यदि आप ऐसा सोचते हैं तो ये भी अच्छा है,पर ये समझ में ज्यादातर आता है कि जानवर 
भी ऐसे ही होते हैं,वो भी एक दूसरे की सहायता करते हैं,
जबकि इंसान कई समय खुद के हित के,इन्हे उपयोग करते हैं,वहीं कुछ इंसान अपना पूरा जीवन ही वाइल्ड लाइफ में बीता देते हैं,तो क्या,दर्द हो सुख का रास्ता है?
या फिर सुख दर्द को मिटा कर जीवन को स्वीकार करता है,ये एक ऐसा सच है जो,ये साबित खुद ही करता है कि
हमारा वातावरण हम पर असर डाल रहा है, क्योंकि हम
परिस्थिति के अनुसार ही कार्य प्रणाली को समझ रहे हैं,
इस सब के बीच,मुस्कुराहट और तकलीफ़ दोनों महत्वपर्ण हैं,मुस्कुराहट शरीर में ऐसे हार्मोन को उत्पन्न
करती हैं,जो जीवन के लिए जरूरी है, हां ये जरूरी है कि
मुस्कुराहट नकली न हो,जबकि दर्द हमेशा असली ही होता है,आजकल लोग दोनों ही क्रिएट कर लेते हैं,तो
सम्पूर्ण जीवन कैसे बिताए इसके लिए भी कई तरह के
प्रक्रिया है,इसको एक उदाहरण से समझ ने का प्रयास करते हैं, जैसे "कोई बच्चा जीवित और अच्छा जन्म लेे और माता पिता ने पूरी तरह से उस नव मास को हंसी ख़ुशी से सुखद पारिवारिक वातावरण में बिताया हो तो
वह बच्चा निश्चित ही अपना पूरा जीवन ऐसे ही बिताएगा
चाहे परिस्थिति कुछ भी हो,वहीं यदि कोई माता पिता
ने इस नव मास को दुःख और तकलीफ़ में बिताया हो तो
वह बच्चा दुःख में उत्पन होगा,और इसे वातावरण कि तरफ लगातार आकर्षित होगा जो उसे सुख या ख़ुशी प्रदान करें"
मल्लिका जैन
अस्तू 😀

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