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बुद्ध और भगवान

ऐसा कहते है (मैने सुना और पढ़ा है)भगवान भी बुद्ध  की शरण में खड़े हो जाते थे,ऐसी एक घटना और कथा है,एक बहुत महंगे कपड़े बेचने वाला व्यापारी जब बुद्ध के,पास गया तो,बुद्ध के प्रवचन पूर्ण हो जाने पर भी वह  वनहा रुका रहा और कुछ वस्त्रों को उपहार स्वरूप बुद्ध को अर्पित किया,तब आगे यह व्यापारी भी यह कहते हुए वहा से निकला"मैने तुम्हे जीत लिया",तो लोगो ने पूछा क्या जीत लिया,तुमने उस व्यापारी ने जवाब दिया, "मन" इतनी खूबसूरत बात को वह व्यापारी कुछ ही समय में बुद्ध के पास जाने पर कैसे समझ गया,जबकि बाकी के उनके संघ के भिखू ओ ने नहीं कहीं, तो अब सवाल यह उठता है कि क्या यह समुदाय जो इतने समय से बुद्ध के साथ चले,उन्हें क्या मन का पता नहीं था,या फिर व्यापारी क्योंकि लम्बे समय से एक ऐसी व्यवस्था में चल रहा था जो,व्यापार की समझ रखती थी,वो "लकीर का फकीर"नहीं था इसलिए गृहस्थ होते हुए भी "मन"जैसे जटिल विषय को समझ गया, हां सवाल तो कई है फिर भी, मन एक अत्यंत ही जटिल विषय आज तक इसलिए  है क्योंकि,इस पर जीत हासिल करना आसान तब ही हो सकता हैं,जब आपके पास बुद्ध जैसा कोई हो,क्...