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🛢संघ और धर्म🔮

"संघ और धर्म" एक सिक्कें के दो पहलू की तरह है, "जब कोई ऐसा व्यक्ति,जो मानसिक,सामाजिक,शारीरिक,और धन का उपयोग कान्हा और कैसे किया जाए ये जान जाता हैं तो वह यदि अपने आप मे भावनात्मक तत्व को भी उतना ही मजबूत कर लेते है, तो लगभग बुद्ध जैसी इस्थिति बन सकती हैं,  ऐस व्यक्तित्व का जो वास्तविक स्वामी याने की ठीक ऐसा ही जानने और समझने वाला होता हैं, तो उसके साथ,ऐसे व्यक्ति जुड़ते हैं जो किन्ही कारणों में से एक न एक विचार धारा को समझ सकते हैं यह ही वस्तविक संघ का मतलब होता हैं।" अब बुद्ध ने धर्म नही बनाया था और न ही संघ,जब बुद्ध ने इस बात को देखा कि जो वो बतलाते,उसके मानने वाले,सही तरह से उस बात का पालन करने की कोशिश, करते है या उन्हें मदत की जरूरत पड़ती हैं, तब संघ को उन्होंने बनाया, फिर जो बताया वह धर्म बना। (यंहा धन शब्द का प्रयोग उचित किया गया है, क्योंकि, धन की आवश्यकता संघ को चलाने के लिये भी होती हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे, किसी राज्य,व्यक्ति,देश,या फिर एक सामान्य परिवार में,) मल्लिका जैन😃