वैरी फर्स्ट, समाज का मतलब क्या है?सभी जानते हैं,
जिसमे हम रहते हैं तो,क्या हम इससे सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं? या फिर किसी अपने ही दायरे में सिमट जाते हैं,ज्यादातर ऐसा ही होता है,व्यक्ति उस दायरे में सिमट जाते हैं जो उनके व्यवहार में और उस समय में
समाज में चल रहा होता है, तो यदि कोई ऐसा हो जो
इस व्यवस्था से आगे हो तो इसका मतलब स्पष्ट है कि
समाज उस व्यक्ति के अस्तित्व से इंकार करेगा या फिर
यदि वह सफल है तो,उस व्यक्ति से इतनी एक्सपेक्टेशन
रखेगा, जिसकी उस संबंधित व्यक्ति को कोई जरूरत नहीं होती,अब वह व्यक्ति क्या करें की उसकी लाइफ
में इन सब का प्रभाव सामान्य हो जाए,?क्योंकि, संबंधित व्यक्ति की अलग अपनी खुद कि एक्सपेक्टेशन भी है जो
उस समय से बेहद आगे कि है,तो यहां पर ऐसी कल्पनाओं का जन्म होता है जो कि किस प्रकार इस समाज और उस व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करती हैं,
जो उसके वास्तविक जीवन में फोर्स का कार्य करती हैं
ये व्यक्ति,यदि इतना सब समझ लेता है,तो जब भी, कोई
कार्य करेगा,उसमे उसके वे सहायक या तो शामिल हो जाएंगे जो उस व्यक्ति के प्रति ईमानदार हैं,और जो नहीं है, वे साथ छोड़ देंगे,इस तरह से वो व्यक्ति की अपनी
अलग दुनिया पुनः स्थापित हो जाती हैं, (कुछ ऐसा ही सामान्य व्यक्ति के साथ भी होता है,पर वे इसे समझ नहीं पाते) तो बहुत सीमित शब्दों में व्यक्त मेरे विचार है, जिस बात को बुद्ध ने अपनी कई कहानियों में बताया जो की,
उनके जीवन में घट रही थी 🤗
मल्लिका जैन
अस्तु
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