बुद्ध और महावीर दोनों ही सम कालीन थे,जिसका सबूत कई जगह मिलता है जिनमे से अजंता एलोरा गुफाएं एक है,जंहा कई तरह की रचनाएं निर्मित हुई हैं और लोगो ने,
उसे सिर्फ अपनी बेवकूफी के कारण,या समझ में नहीं आ पा ने के कारण कुछ और ही समझ लिया,अब ज्यादातर समय से ऐसी सभी जगह अर्कलाजी डिपार्टमेंट ने टूरिस्ट के लिए दर्शनीय स्थल बना दी है,जबकि वो उनको लोगो की ध्यान स्थली भी रही हैं,अब जब लोग वनहा पर रहे तो उनके साथ विभिन्न तरह की घटनाएं हुई
जिन्हे लोगो ने अपनी अपनी सोच के हिसाब से समझा,
तो इस अजंता एलोरा,क्या है,ये मै दावे से नहीं कह सकती की मै ही अब कुछ जानती हूं,पर,जब कोई इंसान की वास्तविक जीवन में देखता है,तो पता चलता है,सब कुछ उतना अच्छा नहीं है, यनहा लोग,उन हकीकत को देखना और समझ ना चाह रहे है जो बीते समय में हुई थी,पर आज हकीकत बदल चुकी हैं,लोग जिनके पास इस बात की क्षमता है जो बीते समय में जा सके या उसे क्रिएट कर सके,वे उसे कई बार बनाते और बिगड़ते रहते, हैंक्योंकि वो ये जानते हैं कि आम इंसान के बस की बात है ही नहीं,की वो वह कर सके जो ये सब समर्थ वान आज के समय के सम्मानित लोग कर रहे हैं,क्योंकि इन सम्मानित लोगो के लिए आम इंसान कोई मायने नहीं रखता, हैं, तो जो लोग ऐसा सोचते और समझ ते हैं वे शायद आज भी सिर्फ एक छोटी सी बात नहीं समझ पा रहे की किसी के सब कंसास लेवल पर राज करना इतना
आसान नहीं है,क्योंकि हर बार इंसान का अब कंसास उस इंसान का ही साथ देगा जो उसका खुद का है किसी और का अधिकार कभी भी कोई नहीं ले सकता,अब किसी रियलिटी को क्रिएट करने का प्रयास करके भी कुछ हो नहीं सकता,क्योंकि, उस इंसान के अधिकार नहीं के सकता जो उसके जीवन के लिए जरूरी है, तो फिर
मै तो कभी स्थानों पर गई नहीं पर,बुद्ध और महावीर दोनों ने ही किसी बेवकूफी के लिए निश्चित ही उसे नहीं बनाया ना ही ये कहा कि,मूर्तियां स्थापित करें,पर जब लोगो ने उस स्थान के महत्व को जाना तो सिर्फ इतना ही
जितना वो सोच सके जो कि सिर्फ शारीरिक स्तर पर ही था,जबकि वास्तव में जब ऐसा कोई प्रयोग किया जाता हैं,जब की व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध हो तो, शरीर इंकार कर देगा और दिमाग तुरंत ही अपना अलार्म बजा देता है,पर जो लोग इस बात को लेकर सिर्फ बार बार, सौदेबाजी की तरह व्यवहार करते है,तो मुझे बेहद तकलीफ़ होती है,क्योंकि मै उस स्तर नहीं जन्ह पर वो सब थे,इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है,की में किसी का सर्थन कर रही हूं या किसी को नीचा दिखाने का प्रयास कर रही हूं,सिर्फ अपनी बात रख रही हूं,ये अच्छा है कि कुछ वर्ग इस बात को समझ रहे, हैं पर ध्यान की प्रकिया,
इतनी आसान है, जितना कि हमारे शरीर में सांस का आना और जाना जिसे आज कल आना पाना सती ध्यान के माध्यम से जाना जाता है,,(अब यदि किसी को यह पता चल जाए कि इंसान के शरीर में किसी और जीव को प्रवेश इस माध्यम से भी कराया जा सकता है, तो वो लोग,अपनी तकनीक का सहारा ले कर जो निश्चित ही वह व्यक्ति नहीं जानता जिस पर प्रयोग किया जा रहा है,
तो )व्यक्ति ने किसी भी प्रकार की परिस्थिति को को निर्मित किया जा सकता है,और ज्यादातर ये अपने स्वार्थ के लिए ही करते है,जो तो ना कभी बुद्ध ने किया,होगा और न ही महावीर ने, इसलिए जब भी सांस के आने और जाने पर ध्यान अधिक दिया जाता हैं तो यह प्रक्रिया लगातार शुरू हो जाती हैं,,इस िइस्थीती में एक पल या समय ऐसा आता है,जब इंसान वास्तव में उस सच को देख सकता है जो वो खुद है,पर जब दूसरा कोई इसमें हस्त छेप कर देता है तो उस व्यक्ति का,वस्त्विक स्वरूप सामने न आ कर वह सामने आता है, जो,हस्तछेप करने वाले ने डाल दिया है, तो यहां पर आज कल सारी िइस्थीती पलट जाती है,
अस्तु
मल्लिका जैन 🌝
आपकी बात कितनी सही है या गलत यह तो नहीं जानते, किन्तु इतना अवश्य जानते है कि मनुष्य की फ्री विल इस बात का अधिकार और शक्ति देती है कि किसी भी बाहरी तत्व का किसी भी कारण से प्रवेश न हो सके. इसके लिए स्वयं पर विश्वास और स्वास्थ्य आवश्यक है.
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