कर्म का सिद्धांत,उतना पेचीदा नहीं है जितना हम समझ रहे है,बल्कि ये तो आसान है,क्योंकि सिर्फ ये समझ में आता ही नहीं,ऊपर से व्यक्ति ये कभी समझ नहीं पाता कि उसके थॉट का ओरिजिनल वास्तविक नियंत्रण कान्हा है,जो दिमाग में विचारो को डाल रहा है,जब तक आप या कोई व्यक्ति इस बात को समझ की उसके साथ हो क्या रहा है तब तो ज़िन्दगी ही पूरी हो जाती हैं,ऊपर से दिमाग कभी उतना एक्टिव होता ही नहीं,,क्योंकि विचारो को डालने वाली श्रृंखला सिर्फ वही विचााभिव्यक्ति देती हैं, जो वो खुद चाहते है,और इंसान
पूरी ज़िन्दगी ये समझ नहीं पाता उसने आखिर किया क्या जो तकलीफ़ उठानी पड़ रही है,या सुख भोग रहा है,
दोनों एक बरा बर, तो फिर" किस बात का सिद्धांत, यान्हा तो कर्म भी व्यक्ति के हांथ में नहीं है"😀 जो सुख उठा रहा है वो अपने आप में खुश है,और जो दुःखी है वो सुख की तलाश में हैं और इंट्रेस्टिंग दोनों ये जानते ही नहीं की से किसके नियंत्रण में ये सब कर रही है 🌝
तो यदि मै इस बात को समझ गई हूं तो भी मुझे, अब तक नियंत्रक का पता नहीं चला, इसका मतलब स्पष्ट है
की मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है,पर सिखाएगा कोन?
या मै भी यही का हूं कि मै "परम कारण करनाय तस्माए नमः"😀 शायद फिर भी सवाल बाकी ही राह जाएगा,
तो सम्पूर्ण इनलेट मेंट अभी बाकी हैं 👍
मल्लिका जैन 👍
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