व्यक्ति का शरीर, स्वयं में, सक्षम है,और उसमे अनत संभावनाएं हैं,आज के समय में जब लोग टेक्निकल उपकरणों के साथ जीते हैं,तो वे उनका उपयोग सीख
रहे हैं,(साथ ही पहले भी ऐसा होता रहा है)तो बुद्ध ने
आत्मा से इंकार क्यो किया,इस पर कुछ,कोई तभी बोल
सकता है,जिसने स्वयं इस बात को महसूस कर लिया
हो,मतलब,शरीर की वो इस्थिती जिसमें को कंसेंसस रह कर अपने कार्यों को पूरा करने की कोशिश कर रहा है, तो ज्यादातर लोग मृत्यु के बाद ही इसे प्राप्त कर पाते हैं,
और फिर उनका प्रयास शुरू होता,की वे किसी तरह से
खुद को स्थापित कर सके। तो जब बुद्ध ने इसे जाना तो
ये वो समय था जब वो राज महल में ही थे,अब क्योंकि उन्होंने जब तक बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु इसे नहीं देखा,तो उनके लिए सिर्फ यौवन ही सत्य था,(इसे ज्यादातर व्यक्ति हीनयान या महायान तंत्र कहते है)
तो अब जब बुद्ध ने यह जाना की बाकी भी कुछ होता है तो उन्होंने उसे समझ ने प्रयास शुरू किया,लेकिन महल में पुनः पुनः वहीं सब दोहराती हुई बाते थी,इसलिए उनको नए उपुक्त स्थान की आवश्यकता महसूस हुई होगी,और उन्होंने फिर से स्वयं को इसी परिस्थितियों में रखा जो बिल्कुल विपरीत थी,(अब यहां में उन लोगो से माफी चाहती हूं जो सत्य से इंकार कर ते हैं) वैसे तो मै भी सम्पूर्ण सत्य नहीं जानती,पर जितना जाना है, की
यही से आत्मा के अस्तित्व को मानने से इंकार किया क्योंकि यदि वे आत्मा को मानते तो पुनः उन्हीं उन लोगो
को स्वीकार करना पड़ता जो उनके साथ रहे, तो इसका हल ये निकाला गया कि अब अपने दिन प्रतिदिन की प्रक्रिया को वैसा ही व्यक्ति स्वीकार कर लेे,जैसा वो है,तो
संभवतः उसकी मुक्ति का मार्ग जीवित रहते बन सकता है,
साथ ही क्योंकि जंगल में रहने पर जो लोग ध्यान आदि
लगाने की कोशिश करते हैं,उन्हें भी वन्हा रहने वाले जानवर पशु पक्षी के संपर्क से हो कर गुजरना पड़ता है,
और इन्हीं से से इस ज्ञान को प्राप्त करते,साथ ही ओक्सीजन भी भरपूर मात्रा में मिलती हैं,
अब जो व्यक्ति जितना समर्थ वान होगा वो योग्य बन जाता हैं, और अपने कार्यों को पूर्ण कर आगे बढ़ जाता हैं,ये वास्तविक सत्य है,पर आज के समय में क्योंकि कई ऐसे व्यक्ति है,जो इस बात का प्रयोग स्वार्थ हित में करते, हैं,तो उन्हें इसके नुक्सान भी उठाने पड़ते, हैं,नुक्सान सिर्फ इतना है कि व्यक्ति ने जीवित रहते हुए शरीर से बाहर निकालने का प्रयास किया जबकि शरीर अभी भी जीवित है,तो वे जिन भी लोगो या पशु पक्षी आदि से संबंधित जीवन को सीखा वो सीख तो लिया,पर उन्हें उसका भी उपकार स्वीकार करना होता है, तो अब जब ऐसी इस्थ ती निर्मित हो जाती हैं,तब यहां शक्ति शाली या बलवान जैसी प्रक्रिया जो कि उस व्यक्ति की स्वयं की होती हैं,जिससे वो इनको हावी न होने दे और आगे निकल जाए, नहीं तो वह स्वयं उलझ जाएगा,अब यदि,
इसमें....
अस्तु
मल्लिका जैन,👍🌝
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