अक्सर जब भी धर्म के बारे में कोई एक विचार धारा,प्रगट की जाती हैं तो,इसलिए नहीं कि वह व्यक्ति
अपने आप को सर्वे सर्वा बता रहा है,बल्कि इसलिए,
की वह व्यक्ति ये जानता और समझ ता है कि विचारधारा
क्या कर सकती हैं, बुद्ध ने कभी भी किसी धर्म का निर्माण नहीं किया न ही ये कहा कि इसको ही मानो,
उन्होंने ये बताया कि आम इंसान भी चाहे और,उसके
द्वारा किए गए कार्य उसका साथ दे दे तो वह आगे जा सकता है,ये उस समय की बात थी,
आज के समय में लोग जो इस अवस्था में पहुंच जाते हैं,
की वे अपने शारीर से बाहर,निकाल सके,और वो ये चाहते है कि उस मार्ग पर आगे जाए तो, उसके आस पास की परिस्थिति है विशेष तौर पर आज का मोबाइल
नेटवर्क और इससे संबंधित अन्य ये,उस व्यक्ति को ही अपना गुलाम बनाने का प्रयास करने लगती हैं, क्योंकि लोग इथर नेट को नहीं समझ पाते हैं इसलिए,
वे इसका फायदा उठा लेते हैं,जबकि हकीकत ये की,
इस इथर नेट तक भी पहुंच पाना हर किसी के बस की बात नहीं है,तो यहां जिसे हम धर्म समझ रहे है,या एक ऐसा लोक जो की जीवित और जाग्रत हो वो है तो सही और उसका इस बात से कोई लेना देना नहीं है,लोग समाज या कोई धर्म उस व्यक्ति के बारे में क्या सोच रहा है, तो आज जो बुद्ध बनना चाहते हैं, उनको इसका सामना करना पड़ता है, यह आज के धर्म की इस्थीति हैं
इसमें राजनीति का एक अपना ही एक अलग महा त्व है
क्योंकि राजनीति भी इससे अछूती नहीं है, असल में,ये सब कुछ हमेशा से ऐसा ही होता रहा है,, अब यदि कोई ऐसा है जो इथार नेट से आगे जा सके तो भी इसमें लोगो
के ऐसे समुदाय की जरूरत पड़ती हैं,जस विचार धारा को मान कर आगे चलते हैं,
मुझे बुद्धि जिवी वर्ग से कोई शिकायत नहीं है, बस दुःख इस बात का है कि मुझे भी इस तरह के मार्ग का सामना
करना पड़ रहा है, जबकि अब मेरे पास कुछ नहीं जो मेरे
लिए सहायक हो,ये सब लोग पता नहीं किस बात से या तो डरते हैं,या फिर ये उन लोगो को मंजूर नहीं की कोई उनके नियमों से आगे जा कर अपनी राह बना सके।
साथ ही इस बात को समझ ना जरूरी है कि समाज कि
आप से क्या इच्छा है, यांहा जैसे ही आप समाज से जुड़ते हो वो आपकी राय नहीं जानना चाहता बल्कि ये चाहता है कि आप उसके लिए क्या कर रहे हो, यही हालत इस यूनिवर्स की भी है, ऊपर से प्रतियोगिता का
अपना मह्वपूर्ण स्थान जैसे की कोई परीक्षा हो,जबकि परीक्षा देने वाला ये जनता ही नहीं है,वो परीक्षा दे रहा है,
अस्तु
मल्लिका जैन 😀
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