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संदेश

😱बचाना और मरना😀

किसी इंसान के पास जब यह छमता, हो,की वह किसी को वरदान दे सके या फिर श्राप, तो फिर उस व्यक्ति पर इसका क्या प्रभाव  पड़ेगा,साथ ही यह तथ्य भी विचार योग्य हैं,की क्या अन्य भी जो इस ताकत को जानते है,वह उन्होंने कैसे प्राप्त की,और जब पूरी तरह से इस ताकत को प्राप्त हुए लोगो को समझ में आया कि वे इस योग्य हैं,तब क्या हुआ,मतलब यह हुआ,की जन्म और मृत्यु,और इसके मध्य संसार में रहने वाले सभी वर्ग जो इस योग्य हो गए,यहां एक अजीब बात है कि,DNA स्ट्रेचर कई बार बनता और बिगड़ जाता हैं,साथ ही जिसे लोग विभिन्न जीवन प्रणाली समझ ते हैं वह सिर्फ सहायक का समूह बन जाती हैं,अब यहां बात आती हैं, शासन करता उचित हुआ तो व्यवस्था सुचारू होती हैं,यदि शाशन करता ही समझ न पाए तो व्यवस्था दोनों स्तर पर कुछ अलग ही हो जाती हैं,इस बात को वे ही समझ सकते है,जों इस योग्य हो,सब नहीं,बाकी तो सामान्य जीवन जीते हैं,साथ ही जो लोग, शासन करते है,वे हमेशा जीत ना ही चाहते है, कुछ तो इस हद पर पहुंच जाते है,की उन्हे फर्क पड़ना बंद हो जाता हैं, तो अब ये लोग करे क्या क्योंकि सब कर चूके,अब कुछ करने को बचा ही नहीं,यह जो न सिर्फ जान गया बल्क...

शुरुआत और अंत😀

ये समझ पाना आसान नहीं की कैसे शुरुआत हुई और अंत कैसे होगा,कुछ इन्सानों को एहसास होता हैं और, ज्यादातर को नहीं,जबकि ऐसे कई प्राणी है,जिन्हें ये अहसास हो जाता है,ऐसे कई पेड़ और जानवर है जो आने वाले समय को समझ लेते हैं,इन्हे देख कर कुछ इन्सान ठीक ठीक उस बात का पता लगा लेते हैं, जो घटने वाली घटना होती है,आज कल तो विज्ञान काफी आगे है,लेकिन बुद्ध के समय में क्या ये सब नहीं था,या फिर किन्ही अन्य सम्मानित लोगो के समय में ये सब नहीं था,ये सब कुछ तब भी वैसा ही था जैसा आज, फर्क सिर्फ इतना है तब कुछ लोग इसे जानते और उपयोग करते थे,बाकी नहीं और आज भी ये सब ऐसा ही है,फर्क सिर्फ इतना है की,आज भी सब इसे समझ नहीं पाते 😂और ये एक तरह से अच्छा भी है,, मल्लिका जैन अस्तु

मानसिक दशा और जीवन😀

मानसिक दशा सिर्फ, मनुष्य में ही नहीं होती,बल्कि जीव जंतु और पेड़ पोधो में भी होती हैं,जिस तरह व्यक्ति पर वातावरण असर डालता है,, उसी तरह बाकी पर भी,इसका असर होता हैं, ये कोई व्यक्ति तब समझ पाता है,,जब वो इन से जुड़ा हुआ हो,प्रत्येक का इस प्रकृति में अपना स्थान है पर ये जरूरी नहीं,की सब इसे महसूस कर, सकें, हा काफी हद तक विज्ञान के प्रयोग इसे समझ ते हैं,लेकिन, कुछ ऐसा भी। है, समझ से परे हैं,या ये कहे। की सब के लिए जानना आवश्यक नहीं,,पर मनुष्य जो भी सहायता करते है,,वैसे ही बाकी। प्रकृति भी करती हैं, मल्लिका जैन 😀 अस्तु

संबंध और धर्म

अक्सर कहते है,जीने के लिए किसी का भी,समूह  में रहना जरूरी होता हैं,लेकिन,सत्य ये है कि,कितने ही व्यक्ति समूह में रह कर,भी अकेले होते है,जबकि हमेशा कुछ जाने पहचाने व्यक्ति उनके साथ होते है, इस बात को समझ ने कि कोशिश करते है,क्या होता है? व्यक्ति के विचार,उसे समूह से जोड़ कर रखते है, फ़िर भी उसी समुह के व्यक्ति,एक विचार वाले होते हुए भी अलग अलग वातावरण में बड़े होने के कारण,और कभी कभी एक वातावरण के होते हुए भी मानसिक स्तर पर अलग होते हैं,लेकिन कार्यप्रणाली एक हो सकती हैं,व्यक्ति के दिमाग और कार्य व्यवस्था का सन्तुलन ही सामान्य को आगे ले कर जा सकता है यही बात जब किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में,कही जाए जों वस्तव में स्वयं में परिवर्तन चाहता हो,न कि अन्य में,तो ये बात  बादल सकती हैं क्योंकि यहां ऊर्जा के स्तर पर कार्य होते है,यह परिवर्तन,व्यक्ति की ईच्छा होते हुए भी,किसी और के द्वारा होते है,क्योंकि यहां "कार्य और कारण" का प्रमाण वह ही समझ पाता है जो इस तरह की वास्तविक अवस्था से निकाल चुका हो,ये बात जितनी आसानी से मैं लिख रही हूं उतनी आसनी से समझ में नहीं आती, क्योंकि योग्यता का माप ...

आरोग्य और बुद्ध

बुद्ध ने आरोग्य के नाम पर लोगो को ठगा नहीं, न ही कभी किसी की शक्तियों को नस्ट किया, वे हमेशा इस पक्छ में ही रहे की लोग उसका दूर उप योग न करें,आज का समय लोगो के लिए तकलीफ दायक या फिर किन्ही के लिए स्वासथ्यवर्ध्दक इसलिए भी ही गया है,क्योंकि यहां,पर कई छेत्रो में व्यक्ति की वास्तविक ऊर्जा का प्रयोग लोग स्वयं करते हैं और, इन्सान सिर्फ इतना ही समझ ता है उसने कुछ नहीं किया क्योंकि,एक ऐसे एहसास, में रखा जाता है जनहा लोग उस के साथ कुछ भी करें,उसका इंसान को पता ही नहीं चलेगा की उसने क्या किया?तो अच्छा यही है,की आरोग्य,याने स्वास्थ्य के नाम पर ढोंग,न ही किया,जाए तो,बेहतर, बुद्ध ने कभी भी किसी के अध्यात्मिक,तथ्य का उलंघन नहीं किया, है न ही ये कहा की,आप किसी दूसरो के अधिकरबका उलंघन करें,क्या किसी ने कभी भी ये सोचा है की क्या होगा,जब कोई व्यक्ति,ही किसी व्यक्ति को किन्ही कारणों से यहां से वहां भेज दे,और खुद उस व्यक्ति को पता ही न चलें,क्योंकि,,आप से जों लोग ऊपर है या जो तथा कथित अपने आप को ऊपर समझ ते हैं आप को आराम के नाम पर, एक नई, अवस्था में डाल दे,और आपको ये पता ही न चलें,की आप ने किया क्या, इसल...

हंसी😂

कभी किसी ने सोचा है,हंसी कितनी प्यारी है,ये,तब आती हैं,जब,हम भी पता नहीं होता कि हम हंस देंगे, इट्स, ब्यूटीफुल, क्या कभी किसी साधू को हंसते हुए देखा है,जो उसकी वास्तविक अवस्था में हो,ऐसी हंसी,जब भी आती हैं ये कल्याण कारी होती हैं,मुझे लगता हैं,बुद्ध भी  कभी संघ में हंसते होंगे बिल्कुल इंसान जैसे,ही,सोचिए कि बुद्ध जब हंसते हो तो कितनों का कल्याण होता होगा, एक बार बुद्ध से (भंते,नाम याद नहीं इसलिए इसका प्रयोग किया) ने पूछा,आप क्या इस्त्री को संघ में शामिल क्यों नहीं करते वे भी इसकी अधिकारी है,तब बुद्ध मुस्कुरा दिए,और फिर इस्त्री संघ की स्थापना भी हुई,जिन्हें हम कई नामों से जानते हैं,ये सच है कि इनके बारे में कम लिखा या सुना गया,या फिर उन्हें किसी रहस्य जैसा रखा गया,क्योंकि यहां जो नियम है,जिनमें स्पर्श, स्वाद,आदि का वर्णन मिलता है,ये भी स्वत ह शामिल हो गए,ऐसी इस्थीती में,निश्चित ही,कुछ विशेष नियम बने,और पल्लवित भी हुए, जिनमें से कई को लोग,बुद्ध के इस्त्री स्वरूप के रूप में भी मानते,है उन्हीं में से एक है, देवी तारा, कम ही लोग इस बात को जानते है कि,"तारा" बुद्ध का हंसता हुए और क...

क्रिएटिंग अनवर्नमेंट फ़ॉर बिलीव

बुद्ध ने शायद ही कभी इस बात का अंदाज लगाया होगा, की,उनकी कही हुई, बातों का अभी इस प्रयोग भी होगा, जब लोग इस बात को,ठीक वैसा ही समझ पाएंगे,जैसा वे कहतें है,संघ में बुध्द ने,कभी भी इस बात से इनकार नही, किया कि तकलीफ होने पर ट्रीटमेंट न किया जाएं, बल्कि हमेशा,यह बतलाया कि हम सही ,तरह से उपाय औषधि का प्रयोग करे,वे ये अच्छी तरह सर जानते,और समझ ते थे,की,एक ऐसी इस्थिति, भी आई हैं, जब सही, तरह से,वास्तविक स्थिति नही बनती तो लोग उसका गलत,फायदा भी उठा सकतें, है,इसलिए,उन्होंने स्वयं इस बात का ध्यान संघ में रखा,की,स्वयं में ही अर हत्व की प्राप्ति हो, ताकि, कोई,नकली वातावरण तैयार न करे, साथ ही,समर्थ वान ही बुद्ध बन सकें, क्योंकि जब कोई इस वास्तविक इस्थिति में पहुंच जाते हैं तो, उन्हें,अपने आप, ही एक ऐसी अवस्था की प्राप्ति होती हैं, जो प्रशंशा के योग्य होती हैं, न कि किसी का मज़ाक, या फिर धोखा दे कर,वर किसी व्यक्ति को वाहक बनाने के खिलाफ ही रहें,साथ ही यह भी ध्यान रखते थे कि, कोई, अनुभव के स्तर पर भी,योग्य हो न कि दिखावा करने वाला,यही कारण था कि लम्बे समय तक उन्होंने, इस्त्री वर्ग को संघ में नही लिया...