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संदेश

🍋तारा और बुद्ध🍊

बुद्ध और तारा एक दूसरे के सहयोगी है जब भी जंहा भी बुध्द होते है तारा होती हैं, ये दोनों  जब भी उपस्थित होते है,ऐसा कोई भी कार्य जो असम्बभव प्रतीत होता हैं, वह कुछ ही पलों में संपन्न हो जाता हैं यह यथार्थ में सत्य है, बात यह है कि क्या कोई इतना समर्थ वान है जो उस स्तर पर पहुंच सके क्योकि उस सम्बंधित व्यक्ति का उतना समर्थ वान होना आवश्यक है, नही तो सिर्फ एक शिकायत रह जायेगी की मेरे पूजन के उपरान्त भी कार्य सम्पन्न नही हुआ, यह अत्यंत ही संवेदनशील और उच्च स्तर पर संभव होता हैं कुछ ही पलों में रास्ते खुलते हैं और बंद हो जाते है, 😀 😁ॐ तारे😀😁 😁मल्लिका जैन😁

😀नियामत😁

ब्लिस या नियामत इसे समझ ना और तथाकथित किंवदंतियों को समझ कर जो पसंद या उचित नही उसे अलग कर देना और सही बात को स्वीकार कर लेना ये भी अक्सर ऐसे लोगो का खिलौना बन जाता हैं जो इस बात से सहमत हो कर भी सहमत नही होते,मतलब की  वे किन्ही बातों को बोलना ही नही चाहेगे तो अब ब्लिस कैसे प्रप्त हो, क्या दवाई क्या दुआ या फिर स्वयं मृतयू या फिर जन्म या विवाह प्रस्ताव सभी के पास होते है  कोई किसी को स्वीकार करता है और कोई किसी को फिर भी पुनः प्रयास जारी रहते है किसी उचित स्थान पर पहुंच ने बाद भी  😁 😁 मल्लिका सिंह💎

😁वक्त की बात😁

बुद्ध समय मे जा सकते और समय के साथ किन्ही में परिवर्तन कर सकने में समर्थ होते है यह सच है पर क्यो यह करना चाईए यह विचार योग्य प्रश्न है, यँहा व्यवस्था का मतलब और समय का मतलब सिर्फ बात को साबित करना नही होता, क्योकि जो लोग किसी को दिया हुआ वापस ही नही करना चाहते तब क्या किया जाए तब परिवर्तन करना पड़ता हैं, पर जब यह समझ के आ जाये कि विवाद का कारण यह नही की सत्य क्या है, बल्कि यह है कि जिन्हें दया या भूल वश कुछ मिल गया था वे ही अब उस प्राप्त को अपना समाझ ने लगे तो,क्या बुध्द इस तरह के विवाद से भी निपट सकने में समर्थ हैं तो जवाब हा है, पर जब कोई हर समय यह बताया करें कि दया और करुणा बस मूर्ख या ऐसे लोगो का अधिकार है जो कि स्वयं समर्थ नहीं तब,उन्हें बताने के लिए बुद्ध किसी को कुछ भी साबित किये बिना सिर्फ अपना कार्य कर देते है, औऱ जिन योग्य को अयोग्य साबित किया जाता हैं वह स्वयं ही साबित हो जाता हैं, यह न्याय व्यवस्था भी होती हैं  क्योकि व्यवस्था बना कर रखना है और नियम बनाना यह वे स्वयं कर सकते है जो समर्थ होते है इसका मतलब यह नही की जिन लोगों ने कुछ भी किया हो वे उस के अधिकारी हो गए है😀?...

😃समस्याओं का अंत😁

हर दिन विचार करते है कि समस्याए का निराकरण कैसे हो सकता हैं, पर कही न कही कुछ ऐसा होता हैं जो विचार,व्यवहार और व्यवस्था में सुधार के साथ चलता है जिनका व्यवस्था आवश्यक होती हैं जिनमे सुधार की जरूरत होती हैं, पर कोई उन्हें करना नही चाहते ,किसी का कुछ और किसी का कुछ जिस कारण से एक ऐसा तारतम्य व्यवस्थित होता हैं जो सदैव ही सुधार की इस्थित में होता हैं, जिन्हें सुधारना ही होता हैं, पर बात यँहा पर रुकी होती हैं कि उत्तरदायित्व कौन उठायेगा, सहायता किसे मिलनी चाहिये और किसे नही यह भी विचारणीय प्रश्न बन जाता हैं ऐसे सवाल और जवाब की तरह जो कभी तो सदैव ही सवाल होते है और जो कभी ऐसे सवाल जिनके उत्तर सामने ही होते है पर समझ और उपयोग में लाना आसान कैसे बने इस बात पर रुके होते है, जब बात बुध्द की हो तो वे सदैव ही ऐसी  व्यवस्था के साथ चले जो किसी पर लादी न जाये बल्कि व्यवहार में और प्रयोग और उपयोग में आसन हो मतलब जिसे किसी उत्तरदायी व्यक्ति से करवाया जाए और उचित को उसका लाभ प्रप्त हो सके। 😀मल्लिका singh har din vichaar karate hai ki samasyae ka niraakaran kaise ho sakata hain, par kahee na kahee ...

😂स्वयं की इच्छा😂

ज्यादातर समय मनुष्य जब आगे बढ़ने लगता हैं तो उसे कोई जो भी योग्य नही है, वह  रटा हुआ एक राग अलापते है जिसे प्रेम का नाम दिया जाता हैं और जिन्हें कुछ भी नहीं आता वो खुद को इस अंकेन्डिशन लव की आड़ लेकर स्वयं को उस से बेहतर बताते है जो वो खुद नही होते,अब प्रश्न यह उठता है कि क्या जो जीव को यह समझ मे नही आता कि यह संबंधित व्यक्ति क्या चाहता है, आता हैं पर जो लोग किसी दूसरे पर इस तरह से अतिक्रमण करते है वे ही स्वयं को योग्य साबित करते है जबकि होते नही,जीवन के रहस्य आसानी से हर किसी को नही मिलते इसके परिणाम स्वरूप कही क्रोध का जन्म हो सकता हैं या फिर अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता हैं तो जब कोई जवाब नही मिलता हैं क्या किया जाये और जिनको इस बात का अहसाह भी नही की मर्यादा क्या होती हैं वे निश्चित ही किसी न किसी तरह की तकलीफ तो उठाये गे ही,जो दूसरों की शक्तियों को स्वयं लेते है बिन उसकी मर्जी के ऐसे लोग ही युद्ध को निमंत्रण देते है,जिन्हें ये लगता हैं कि वह व्यक्ति जो ठीक है और अपनी सुरक्षा करना जनता है वे उसे बार बार तंग करते है ये जीव माफी के काबिल नही होते, ये सिर्फ स्वार्थी होते है, ...

😁कार्य😀

 शुभकामनाएं बुद्ध के जन्म, ज्ञान निर्वाण दिवस की कार्य तो करना ही होता हैं, पर उसके परिणाम पर भी विचार करना होता हैं, बुध्द ने क्या कभी कार्य किये होंगे, तो जवाब हा में ही है, बुद्ध स्वयं के तरह से कार्य करते और करवाते भी थे,जब कोई उनकी बातों को सुनता तो वे उसे अपने को उस स्तर को समझ कर बताते थे इसलिए उस सम्बंधित व्यक्ति या भगवान या अन्य के कार्य होते थे, यह सच आज भी उतना ही सत्य और सटीक है। 😀मल्लिका सिंह😁

😁यात्री और यात्रा😁

समय एक ऐसा परिणाम है जो अनन्त है,पर कई ऐसे के प्रमाण मिले हैं जिसमे यह पता चला है कि इससे परे भी जाया जा सकता हैं, विश्वास करना अच्छा है पर अंध विश्वास उचित नही,जो खुद को किसी का दास बना दे ऐसी व्यवस्था ही अक्सर चलती हैं, इसका उदाहरण यह है कि आप किसी न किसी की व्यवस्था के अनुसार चलते हैं जो या तो स्वीकार होती या नही,जो ये व्यवस्था बनाते है वे खुद भी इसी व्यवस्था से आगे निकल आते है फिर जब कोई अपने नियम या निर्णय स्वयं करता है तो स्वयम ही अपने कार्यो के लिए उत्तरदायी बन जाता हैं,पर क्या वास्तव में ऐसा होता हैं, यह कोई जान नही पता और जो जानते है वे इसका कोई सही हल नही बताते, क्योकि वे लगातार ऐसी प्रक्रिया का निर्माण करते है जो पुनः पुनः किसी निर्धारित कार्यवाही की तरफ ले जाती हैं तब, परिणाम मन मुताबिक न हो तो इसे स्वीकार नही किया जा सकता,और व्यक्ति पुनः अपने प्रयासों में लग जाते है यह प्रक्रिया हर बार समय और परिश्रम दोनो ही लेती हैं साथ ही उसमे लगने वाला प्रयास के वंचित परिणाम पर भी प्रभाव डालती हैं 😁मल्लिका सिंह😁