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😄🙏 बुद्धि ऐसी भी🙏

"इस कहानी का उद्देश किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है"  🙏मै,अक्सर ये समझ ने कि कोशिश कर रही हूं कि बुद्ध ने क्या प्राप्त किया होगा कि,आज तक लोग उनको समझ ने का प्रयास कर रहे है,जबकि यदि में(धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा रही सिर्फ अपनी इस्थीती को व्यक्त कर रही हूं) ये की सही व्यवस्थाओं के साथ इंसान को कैसे जीना चाहिए,क्योंकि बुद्ध से संबंधित सभी बाते ये व्यक्त करती हैं,उन्होंने किसी को भी,ये नहीं कहा कि तुम इसी को धर्म  मा न लो क्योंकि है इस बात को वैज्ञानिक तरीके से समझ या जो की उस समय के लोग मनुष्य आदि समझ पाते होंगे, प्रत्येक गाथा या अन्य ग्रंथ जो बुद्ध से संबंधित है,कोई भी ऐसा नहीं जो पढ़ कर अपनी स्वयं की बुद्धि का प्रयोग न करें,क्योंकि, चाहे हीनयान या फिर महायान,(या अन्य कोई मत हो तो भी,)तो आज का व्यक्ति वर्तमान में अपनी सामान्य ज़िन्दगी से ही बाहर नहीं निकल पा रहा है,तो धर्म फिर यही हो गया,और जो वास्तव में कुछ समझ कर आगे जाना चाहे वो कैसे आगे जाए,क्योंकि जब सामान्य व्यक्ति इसमें होगा तो,अपनी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करते है और,अपने अपने हिसाब से उसमे उलट...

मन से बड़ा कुछ नहीं

गाथा    मनोपुब्बंगमा धम्मा,मनोसेट्टा मनोमया।   मनसा चे पदुट्टen ,भासति वा करोति वा।   ततो न दुःख मन्वेति चक्कं वा वहतो पदं।।1।।    अर्थ- मन सभी प्रवर्तियों का प्रधान है।  सभी धर्मं (अच्छा या बुरा) मन से ही उत्पन्न होते है।  यदि कोई दुषित मन से कोई कर्म करता है तो उसका परिणाम दुःख ही होता है।  दुःख उसका अनुसरण उसी  प्रकार करता है जिस प्रकार बैलगाड़ी का पाहिया बैल के खुर के निशान का पीछा करता है।    चक्षुपाल  कि कथा  स्थान : जेतवन  श्रावस्ती मन से बड़ा कुछ नहीं एक दिन भिक्षु  चक्षुपाल जेतवन विहार में बुद्ध को श्रद्धा सुमन अर्पित करने  आया रात्रि में वह ध्यान साधना में लीन टहलता रहा।  उसके पैर के नीचे कई कीड़े-मकोड़े दबकर मर गए।  सुबह में कुछ अन्य  भिक्षुगण वंहा आये और उन्होंने उन कीड़े-मकोड़ो को मारा हुआ पाया  . उन्होंने   बुद्ध को सूचित किया कि किस प्रकार चक्षुपाल ने रात्रि बेला में पाप कर्म किया था   बुद्ध  ने उन भिक्षुओ से पूछा की क्या उन...